मटमटहा टूरा 1

मटमटहा टूरा
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पढ़ई लिखई में ठिकाना नइहे ,गली में मटमटावत हे
हार्न ल बजा बजा के ,फटफटी ल कुदावत हे |

घेरी बेरी दरपन देख के , चुंदी ल संवारत हे ।
आनी बानी के किरीम लगा के ,चेहरा ल चमकावत हे |

सूट बूट पहिन के निकले , चसमा ल लगावत हे ।
मुंहू में गुटका दबाके , सिगरेट के धुंवा उड़ावत हे |

मोबाइल ल कान में लगाके , फुसुर फुसुर गोठियावत हे ।
फेसबुक अऊ वाटसप चलाके , मने मन मुस्कावत हे |

संगी साथी संग घूम घूमके , आदत ल बिगाड़त हे ।
फोकट म खाय ल मिलत त , बाप के कमई ल उड़ावत हे |

लाज शरम तो बेचा गेहे , कनिहा ल मटकावत हे ।
नाक ह तो पहिली ले कटा गेहे , अब कान ल छेदावत हे |
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रचनाकार
महेन्द्र देवांगन "माटी"
राजिम
मो. 8602407353

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