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मोर छत्तीसगढ़ महतारी

*मोर छत्तीसगढ़* (गीत) मोर छत्तीसगढ़ महतारी हा , सरग बरोबर लागे । गुरतुर गुरतुर भाखा बोली , सबके मन ला भा गे ।। मोर छत्तीसगढ़ महतारी हा .......... ................               भेदभाव नइ जानय इँहा  ,                 सबके सेवा करथे ।                मिल बाँट के खाथे सुघ्घर ,                 दुख पीरा ला हरथे । धरती दाई के सेवा खातिर, बिहना ले सब जागे । मोर छत्तीसगढ़ महतारी हा , सरग बरोबर लागे ।।                आनी बानी तीज तिहार ला ,                  मिलके सबो मनाथे ।              ...

मटमटहा टूरा 1

मटमटहा टूरा ---------------- पढ़ई लिखई में ठिकाना नइहे ,गली में मटमटावत हे हार्न ल बजा बजा के ,फटफटी ल कुदावत हे | घेरी बेरी दरपन देख के , चुंदी ल संवारत हे । आनी बानी के किरीम लगा के ,चेहरा ल चमकावत हे | सूट बूट पहिन के निकले , चसमा ल लगावत हे । मुंहू में गुटका दबाके , सिगरेट के धुंवा उड़ावत हे | मोबाइल ल कान में लगाके , फुसुर फुसुर गोठियावत हे । फेसबुक अऊ वाटसप चलाके , मने मन मुस्कावत हे | संगी साथी संग घूम घूमके , आदत ल बिगाड़त हे । फोकट म खाय ल मिलत त , बाप के कमई ल उड़ावत हे | लाज शरम तो बेचा गेहे , कनिहा ल मटकावत हे । नाक ह तो पहिली ले कटा गेहे , अब कान ल छेदावत हे | ---------------- रचनाकार महेन्द्र देवांगन "माटी" राजिम मो. 8602407353

औघड़ दानी

औघड़ दानी भोले बाबा औघड़ दानी, जटा विराजे गंगा रानी । नाग गले में डाले घूमे , मस्ती से वह दिनभर झूमे।। कानों में हैं बिच्छी बाला, हाथ गले में पहने माला । भूत प्रेत सँग नाचे गाये, नेत्र बंद कर धुनी रमाये।। द्वार तुम्हारे जो भी आते, खाली हाथ न वापस जाते। माँगो जो भी वर वह देते, नहीं किसी से कुछ भी लेते।। आप सभी को महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ । महेन्द्र देवांगन माटी राजिम छत्तीसगढ़

कोरोना आल्हा छंद

कोरोना वायरस  (आल्हा छंद) फइले हे कोरोना संगी, मच गेह गा हाहाकार। चीन देश ले आये हावय, एकर आघू सबो लचार।। देश बिदेश सबो जग फैलत, मनखे हावय सब परशान। खतरा हावय अब्बड़ येहा, वैज्ञानिक मन हे हैरान ।। हाथ मुँहू ला धोवव सुघ्घर, साबुन सोडा रोज लगाव। साफ सफाई घर मा राखव, भीड़ भाड़ मा कभू न जाव।। सरदी खाँसी छीक ह आथे, डाक्टर कर तुरंत ले जाव। पानी ला उबाल के पीयव, कोरोना ला दूर भगाव।। हाथ मिलाना छोड़व संगी, कर धुरीहा ले नमस्कार । मुँहू कान ला बाँध के राखव, कोरोना के होही हार।। माँस मदिरा पीना छोड़व ,  ताजा भोजन घर मा खाव। बरतो सब सवधानी भैया , कोरोना ला झन डर्राव।। रचनाकार महेन्द्र देवांगन माटी राजिम छत्तीसगढ़ Mahendra Dewangan Mati @

कमरछठ तिहार

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  ( कमरछठ विशेष  ) लोग लइका बर उपास -- कमरछठ के तिहार ************************************** छत्तीसगढ़ ल धान के कटोरा कहे जाथे । काबर इहाँ धान के फसल जादा होथे ।इहाँ के जादातर मनखे मन ह खेती के काम करथे । किसान मन ह अपन खेत में हरियर हरियर धान पान ल देख के हरेली तिहार मनाथे । हरेली तिहार के बाद से छत्तीसगढ़ में बहुत अकन तिहार मनाये जाथे । ओमे से एक ठन तिहार कमरछठ भी हरे । कमरछठ ल महिला मन अपन लोग लइका के सुख शांति  अऊ समरिद्ध के खातिर मनाथे । भादो महिना के अंधियारी पाँख के छठ के दिन कमरछठ मनाय जाथे ।एला हलसस्ठी भी कहे जाथे । इही दिन भगवान किशन कन्हैया के बड़े भाई बलदाऊ जी के जनम होइस हे । बलदाऊ जी के शस्त्र हल अऊ मूसल हरे । इही कारन ओला हलधर भी कहे जाथे । एकरे नाम से ए तिहार के नाम हलसष्ठी परे हे । ए तिहार ल विवाहित महिला मन अपन लइका के सुख शांति अऊ समरिदधि के खातिर मनाथे । ए दिन महिला मन ह उपवास रहिथे अऊ बिना नांगर चले अन्न जेला पसहर चांउर कहिथे तेला खाथे । आज के दिन महिला मन ह बिहनिया ले जल्दी उठथे अऊ मऊहा या करंज पेड़ के लकड़ी के दतवन करथे । गांव में नाऊ मन ह बिहनिया ले घरो...

भाग्य

  "भाग्य" (सरसी छंद) भाग्य भरोसे क्यों बैठे हो, काम करो कुछ नेक। कर्म करो अच्छा तो प्यारे, बदले किस्मत लेख।। जो बैठे रहते हैं चुपके, उसके काम न होत। पीछे फिर पछताते हैं वे, माथ पकड़ कर रोत।। जो करते संघर्ष यहाँ पर, उसके बनते काम। रूख हवाओं के जो मोड़े, होता उसका नाम।। कर्म करोगे फल पाओगे, ये गीता का ज्ञान। मत कोसो किस्मत को प्यारे, कहते सब विद्वान।। "माटी" बोले हाथ जोड़कर, करो नहीं आघात। सबको अपना साथी समझो, मानो मेरी बात।। रचनाकार महेंद्र देवांगन "माटी" (प्रेषक - सुपुत्री प्रिया देवांगन "प्रियू") राजिम जिला - गरियाबंद  छत्तीसगढ़

शारदे वंदन

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  "शारदे वंदन" चरण कमल में तेरे माता, अपना शीश झुकाते हैं। ज्ञान बुद्धि के देने वाली, तेरे ही गुण गाते हैं।। श्वेत कमल में बैठी माता, कर में पुस्तक रखती। राजा हो या रंक सभी का, किस्मत तू ही लिखती।। वीणा की झंकारे सुनकर, ताल कमल खिल जाते हैं। बैठ पुष्प में तितली रानी, भौंरा गाना गाते हैं।। मधुर मधुर मुस्कान बिखेरे, ज्ञान बुद्धि तू देती है। शब्द शब्द में बसने वाली, सबका मति हर लेती है।। मैं अज्ञानी बालक माता, शरण आपके आया हूँ। झोली भर दे मेरी मैया, शब्द पुष्प मैं लाया हूँ।। रचनाकार  महेंद्र देवांगन "माटी" राजिम छत्तीसगढ़