Thursday, 16 August 2018

सरसी छन्द

सरसी छन्द  ( महेन्द्र देवांगन माटी )
(1)
वीणा वाली हंस सवारी , सुन ले मोर पुकार ।
तोर शरण मा आये हाँवव  , मोला  तैंहर तार ।
मँय अज्ञानी बालक माता,  नइहे मोला ज्ञान ।
आ के  कंठ बिराजो दाई , अपने लइका जान।
तोर दया से कोंदा बोलय,  राग छतीसो गाय ।
महिमा तोर अपार हवय माँ, कोई पार न  पाय ।

(2)
भेद करव झन बेटी बेटा , दूनों एक समान ।
होथे दूनों कुल के दीपक, येला तैंहर जान ।।
पढ़ा लिखा दे बेटी ला तँय , बोझा झन तैं मान ।
पढ़ही लिखही आघू बढ़ही , जग मा होही गान ।।
कमती झन आँकव बेटी ला , बढ़ के हावय आज ।
अपन मूँड़ मा पागा बाँधे , करत हवय जी राज ।।

(3)
रिमझिम रिमझिम बरसे पानी,  दादुर गावय फाग ।
उचक उचक के मछरी घोंघी , झोंकत हावय राग ।।
डबरी डबरा सब्बो भर गे , छलकत तरिया पार ।
नदियाँ नरवा उर्रा पुर्रा , बोहावत हे धार ।।
गाँव गली मा पानी भरगे, भरगे खेती खार ।
चारों कोती पानी पानी, माचय हाहाकार ।।
सावन महिना आ गे भोला , सुनले हमर पुकार ।
प्राण बचा दे अब तो तैंहर, विनती बारंबार ।।

(4)
मोहन नाचय राधा सँग मा , बृज मा रास रचाय ।
मुरली वाले नटवर नागर , अब्बड़ नाच नचाय ।।
बंशी के धुन सुन के राधा,  घर ले भागत आय ।
गजब प्रेम हे मन मा ओकर,  देख देख मुसकाय ।।
नटखट हावय किशन कन्हैया,  माखन मिश्री खाय ।
लुका लुका के ग्वाल बाल सँग, ग्वालन के घर जाय ।।
गोटी मारे मटकी फोरे , चुपेचाप छुप जाय ।
आँख मिचौली करथे अब्बड़, कोनों पार न पाय ।।

(5)
रिमझिम रिमझिम पानी बरसे , दादुर खेलय फाग ।
मछरी घोंघी झिंगरा मिल के, झोंकत हावय राग ।।
डबरा डबरी सब्बो भरगे , छलकत तरिया पार ।
नदियाँ नरवा चारों कोती , बोहावत हे धार ।।

(6)
डमडम डमडम डमरु बजा के,  नाचय भोले नाथ ।
अँग भभूत ला चुपरे हावय , पारवती हे साथ ।।
बघवा छाला पहिरे भोला , तिरशुल धर के  हाथ ।
बइला चढ़ के घूमत रहिथे,  चन्दा चमके माथ ।।
औघड़ दानी शिव भोला हे , दे देथे वरदान ।
सबला अमरित बाँट के सँगी , करथे जी विषपान ।।

(7)
झन कर गरब गुमान तैं सँगी , हो जाबे बदनाम ।
दू दिन के जिनगानी हावय , भज ले सीता राम ।।
राज पाट अउ धन दौलत हा,  संग कभू नइ जाय ।
छूट जही जी इँहचे सब हा,  काम तोर नइ आय ।।
कर ले सेवा दीन दुखी के,  अमर रहि तोर नाम ।
दान पून तैं कर ले भैया,  आही जग मा काम ।।

(8)
बादर गरजय पानी बरसय, छाय घटा घनघोर ।
चमचम चमचम बिजुरी चमकय,  नाचय वन मा मोर ।।
हरियर होगे चारों डाहर , जंगल झाड़ी खार ।
डारा पाना उलहोवत हे , लामत हावय नार ।।
सावन झूला झूलय सबझन,  रुख मा बाँधय डोर ।
चहल पहल होवत हे अब्बड़,  गाँव गली अउ खोर ।।
सखी सहेली सँग खेलत हे , नोनी मन हा खेल ।
लइका मन सब नाचय कूदय, होवत रेलम पेल ।।

महेन्द्र देवांगन माटी
पंडरिया  (कवर्धा )
छत्तीसगढ़
8602407353
Mahendra Dewangan Mati @

मात्रा --- 16 + 11 = 27
सम चरण के आखिर मा गुरु लघु (2 , 1 )

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