Monday, 25 January 2016

गांव ल झन भुलाबे

गांव ल झन भुलाबे
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शहर में जाके शहरिया बाबू ,गांव ल झन भुलाबे |
नानपन के संगी साथी ल,सुरता करके आबे ||
गांव के धुर्रा माटी म खेलके ,बाढ़हे हे तोर तन ह
आमा बगीचा अऊ केरा बारी म ,लगे राहे तोर मन ह
आवाथे तीहार बार ह,सुरता करके आबे
शहर में जाके ……………..
सुरता कर लेबे पीपर चंउरा ल, अऊ गुल्ली डंडा के खेल ल
गांठ बांध ले बबा के बात ल, अऊ मीत मितान के मेल ल
हिरदय में अपन राखे रहिबे, मया ल झन बिसराबे
शहर में जाके………………………….
दया मया ल राखे रहिबे, नता रिशता ल झन भुलाबे
सुघ्घर सबके मान गउन करबे, अपन फरज निभाबे
आँसू बोहावत देखत रहिथे, दाई के सुरता करके आबे
शहर में जाके………………………….
छुटगे होही अंगाकर रोटी ह, अब तो तंदुरी ल खावत होबे
इडली डोसा खा खाके, अब्बड़ मजा पावत होबे
कतको खाले आनी बानी के फेर, तावा रोटी के सवाद कहां पाबे
शहर में जाके शहरिया बाबू, गांव ल झन भुलाबे |

 महेन्द्र देवांगन "माटी"
बोरसी - राजिम (छ. ग.)
8602407353

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