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पुरखा के इज्जत

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पुरखा के इज्जत जनम भर के कमाई ल , थोकिन मा उड़ावत हे । पुरखा के इज्जत ल , माटी मा मिलावत हे ।। मर मर के काम करके , धन ल सकेलीस । लोग लइका पोसीस , अउ कतका दुख ल झेलीस।। बाढ़ गे टूरा तब , गली में मेछरावत हे । पुरखा के इज्जत ल , माटी मा मिलावत हे ।। गली गली मा दारु पी के , लाल आँखी देखाथे । दाई ददा ल कुछु नइ समझे , मारे बर कुदाथे ।। काम बुता तो करना नइहे  , फोकट के घुमथे । जतका लोफ्फड़ टूरा हाबे , हटरी मा मिलथे ।। सबोझन मिल के , रंग रेली मनावत हे । पुरखा के इज्जत ल , माटी मा मिलावत हे ।। मुड़ धर के बइठ गेहे , दाई ददा हा आज । करे बिनती भगवान से , रख ले हमर लाज ।। चढ़ गेहे टूरा मन ल , फैशन के बीमारी । ओकरे पाय नइ करय , छोटे बड़े के चिन्हारी ।। चसमा ल पहिन के , कनिहा ल मटकावत हे । पुरखा के इज्जत ल , माटी मा मिलावत हे ।। रचनाकार महेन्द्र देवांगन माटी (बोरसी  - राजिम वाले ) पंडरिया छत्तीसगढ़ 8602407353 Mahendra Dewangan Mati

नमन करुं

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नमन करुं (ताटंक छंद) मातु पिता के श्री चरणों में,  नित नित शीश झुकाता हूँ । और गुरू के पद रज को मैं,  अपने माथ लगाता हूँ ।। कृपा करो हे मातु शारदा,  शरण आपकी आता हूँ । भूल चूक सब माफ करो माँ , तेरे ही गुण गाता हूँ ।। नमन करुं मैं धरती अंबर , नील गगन के तारों को । नमन करुं मैं चंदा सूरज , उनके सब उपकारों को ।। नमन करुं मैं ईष्ट देव को , कृपा सदा बरसाते हैं । नमन करुं उस सूक्ष्म जगत को , जो उजियारा लाते हैं ।। नमन करुं उस परि परिजन को,  जो सुख दुख में आते हैं । नमन करुं उन मित्र सभी को, हरदम राह बताते हैं ।। नमन करुं मैं सकल चराचर , नदियाँ पर्वत घाटी को । नमन करुं मैं इस धरती के,  कण कण पावन माटी को ।। रचनाकार महेन्द्र देवांगन माटी पंडरिया छत्तीसगढ़ 8602407353 Mahendra Dewangan Mati

तीजा - पोरा के तिहार

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तीजा - पोरा के तिहार छत्तीसगढिया सब ले बढ़िया । ये कहावत ह सिरतोन मा सोला आना सहीं हे । इंहा के मनखे मन ह बहुत सीधा साधा अउ सरल विचार के हवे । हमेशा एक दूसर के सहयोग करथे अउ मिलजुल के रहिथे । कुछु भी तिहार बार होय इंहा के मनखे मन मिलजुल के एके संग मनाथे । छत्तीसगढ़ ह मुख्य रुप ले कृषि प्रधान राज्य हरे । इंहा के मनखे मन खेती किसानी के उपर जादा निर्भर हे । समय - समय मा किसान मन ह अपन खुशी ल जाहिर करे बर बहुत अकन तीज - तिहार मनावत रहिथे । खेती किसानी के तिहार ह अकती के दिन ले शुरू हो जाथे । अकती के बाद में हरेली तिहार मनाथे । फेर ओकर बाद पोरा तिहार मनाय जाथे । पोरा तिहार  ---- पोरा पिठोरा ये तिहार ह घलो खेती किसानी से जुड़े तिहार हरे ।येला भादो महीना के अंधियारी पाँख ( कृष्ण पक्ष) के अमावस्या के दिन मनाय जाथे । ये तिहार ल विशेष कर छत्तीसगढ़,  मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र अउ कर्नाटक मा जादा मनाय जाथे । पोरा काबर मनाय जाथे ---- पोरा तिहार मनाय के पाछु एक कहावत ये भी हावय के भादो माह (अगस्त)  में खेती किसानी के काम ह लगभग पूरा हो जाय रहिथे । धान के पौधा ह बाढ़ जाय रहिथे । धान ह निकल

तोर सपना

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तोर सपना (गीतिका छंद  - श्रृंगार रस ) देख तोला आज मोरे , मन मचल अब जात हे । रात दिन गुनत रहिथौं मँय , तोर सपना आत हे ।। डार खोपा रेंगथस तैं , मोंगरा ममहात हे । देख के भौंरा घलो हा , तोर तीर म आत हे ।। आँज के काजर ल तैंहा , बाण हिरदे मारथस । गाल होथे लाल तोरे , खिल खिला के हाँसथस ।। काय जादू डार दे हस , तोर सुरता आत हे । देखथँव मँय जेन कोती , चेहरा झुल  जात हे रचनाकार महेन्द्र देवांगन माटी पंडरिया छत्तीसगढ़ 17/08/2019 ( छत्तीसगढ़ी भाषा में)

कम परिवार सुखी परिवार

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कम परिवार सुखी परिवार ( चौपाई छंद) जेकर जादा लइका होवय । घेरी बेरी वोहर रोवय ।। पइसा कौड़ी कुछु नइ बाँचय । मुड़ मा चढ़ के लइका नाचय ।। एक कमइया चार खवइया । कइसे बाँचय पइसा भैया । होवत हावय ताता थैया । कइसे पार लगावे नैया ।। रोज रोज के झगरा होवय । घर में दाई अब्बड़ रोवय ।। सिरतो कहिथों नोहय ठठ्ठा । मुड़ के येहा भारी गट्ठा ।। माटी के गा कहना मानव । कम लइका के महिमा जानव ।। कम परिवार सुखी हे जादा । नइ आवय काँही जी बाधा ।। रचनाकार महेन्द्र देवांगन माटी पंडरिया छत्तीसगढ़ 17/08/2019 ( छत्तीसगढ़ी भाषाा में) 

आ गे हरेली तिहार

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आ गे हरेली तिहार  (गीत) आगे आगे हरेली तिहार जी संगी , जुरमिल सबे मनाबो । नांगर बइला के पूजा करबो , चाँउर के चीला चढाबो ।। आगे आगे हरेली तिहार .............................. हरियर हरियर दिखत हे भुइयाँ ,खेती खार लहराये । छलकत हावय नदियाँ तरिया,  सबे के मन ला भाये ।। छत्तीसगढ़ के सुघ्घर माटी,  माथे तिलक लगाबो । आगे आगे हरेली तिहार ..................... .......... नांगर बक्खर के पूजा करबो , गरुवा ल लोंदी खवाबो । राउत भैया मन राखे रहिथे , दसमूल कांदा खाबो ।। हरियर हरियर लीम के डारा , घर घर आज लगाबो । आगे आगे हरेली तिहार ................................ बरा सोंहारी ठेठरी खुरमी , चीला के भोग लगाबो । खो खो कबड्डी फुगड़ी बिल्लस , सब्बो खेल खेलाबो ।। लइका मन सब गेड़ी मचही , सबझन खुशी मनाबो । आगे आगे हरेली तिहार ................................. गीतकार महेन्द्र देवांगन माटी पंडरिया छत्तीसगढ़ 8602407353 Mahendra Dewangan Mati

नाग पंचमी

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" नागपंचमी " के तिहार हिन्दू समाज में देवी - देवता के पूजा करे के साथ - साथ पशु - पक्षी अऊ पेंड़ - पौधा के भी पूजा  करे  के  रिवाज हे । सब जीव - जन्तु उपर दया करना हिन्दू समाज के परम्परा हरे । उही परंपरा के अंतर्गत हमर समाज में सांप के भी पूजा करे जाथे । सावन महीना के अंजोरी पाँख के पंचमी के दिन नाग देवता के पूजा करे जाथे । ये दिन नाग पंचमी के रूप में मनाये जाथे । नाग पंचमी के दिन गाँव - गाँव में विशेष उत्साह रहिथे । ये दिन धरती ल खोदना मना रहिथे । आज के दिन नाग देवता ल दूध पियाय के परंपरा हे । एकर पहिली माटी के नाग देवता या चित्र बनाके ओकर पूजा करे जाथे । नारियल, धूप , अगरबत्ती जलाके दूध चढ़ाये जाथे अऊ कोनो परकार के हानि मत पहुंचाय कहिके विनती करे जाथे । आज के दिन गाँव - गाँव में कुसती प्रतियोगिता होथे । जेमे आसपास के बड़े - बड़े पहलवान मन आके अपन दांव पेंच देखाथे , अऊ वाहवाही लूटथे । हमर देश ह कृषि प्रधान देश हरे । खेत मन में सांप ह  रहिथे अऊ जीव - जन्तु ,  मुसवा आदि मन फसल ल नुकसान पहुंचाथे ओकर से भी रकछा करथे । एकरे पाय एला छेत्रपाल भी  कहे जाथे । साप ह बिना क