जागव दूसर राज के कोलिहा मन , शेर सही गुर्रावत हे । हमरे राज में आके संगी , हमी ल आंखी देखावत हे छत्तीसगढ़ीया सबले बढ़िया, सुन सुन के आवत हे । थारी लोटा धर के आइस तेमन , अपन धाक जमावत हे । जेन ल हम ह जगा देहन , उही हक जमावत हे । हमर घर हे टूटहा फूटहा, वो महल अटारी बनावत हे । पहुना होथे भगवान बरोबर, थारी थारी खवावत हे । उही थारी में छेदा करके, अब चार आंसू रोवावत हे । जागो जी सब छत्तीसगढ़ीया, अब तो होश में आवव । छत्तीसगढ़ के लाज रखे बर , सबझन आवाज उठावव । रचना महेन्द्र देवांगन माटी पंडरिया कवर्धा छत्तीसगढ़ Mahendra Dewangan Mati