Tuesday, 11 October 2016

देवारी तिहार आवत हे

देवारी तिहार आवत हे
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फुरुर फुरुर हावा चलत,जाड़ ह जनावत हे ।
दसेरा ह भुलकगे, देवारी ह अब आवत हे ।

माटी के कोठ ल, दाई ह छबनावत हे।
ओदरे हे चंऊरा ह, बबा ह बनावत हे।

भर भर के गाड़ा में, माटी ल डोहारत हे।
दसेरा ह भुलकगे, देवारी ह अब आवत हे।

फुट गेहे भांड़ी ह, कका ह उठावत हे।
कोरई के राईचर ल, घेरी बेरी बनावत हे।

बखरी बारी ल, रोज के सिरजावत हे।
दसेरा ह भुलकगे, देवारी ह अब आवत हे।

गाँव गली कोलकी ल, रोज के बहारत हे।
दऊंड़ दऊंड़ के बोरिंग ले, पानी डोहारत हे।

गोबर में अंगना ह, रोज के लीपावत हे।
दसेरा ह भुलकगे, देवारी ह अब आवत हे।

नावा नावा कपड़ा ल, नोनी बाबू सिलावत हे।
हांस हांस के अपन , संगवारी ल देखावत हे।

आनी बानी के सबोझन, फटाका लेवावत हे।
दसेरा ह भुलकगे, देवारी ह अब आवत हे।

अपन अपन घर ल,सब कोई लीपावत हे।
कपाट बेड़ी मन में, रंग ल लगावत हे।

माटी के दीया ल , घर घर जलावत हे।
दसेरा ह भुलकगे, देवारी ह अब आवत हे।
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रचना
प्रिया देवांगन "प्रियू"
गोपीबंद पारा पंडरिया
जिला -- कबीरधाम  ( छ ग )
Email -- priyadewangan1997@gmail.com

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