Tuesday, 3 May 2016

गरमी के दोहे

गरमी के दोहे
*****************
तात तात हावा चले, पसीना ह बोहाय ।
कतको पानी पी तभो, टोंटा बहुत सुखाय।।

गरम गरम लू चलत हे, गोंदली ल तैं राख ।
मुंहूं कान ल बांध ले , कर जतन तहूं लाख ।।

चट चट भुइयां जरत हे, तीपत हे मुड़कान।
छांव नइहे रसता में, लगत हे हलाकान ।।

खटर खटर पंखा चले, नींद घलो नइ आत ।
मच्छर ह चाबत हाबे, कइसे कटही रात ।।

साग पान मिठाय नहीं, बासी बने सुहाय ।
चटनी पीस खाले तैं, आमा बने लुभाय ।।

महेन्द्र देवांगन माटी

No comments:

Post a Comment