Monday, 4 April 2016

गरमी के मारे

गरमी के मारे
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का लिखों कहिके, मन में सोंचत हों

गरमी के मारे पसीना ल पोंछत हों

चइत के महिना में, अतेक भोंभरा जरत हे

चिरई चिरगुन मन, पियास में मरत हे

पंखा के हावा गरम गरम लागत हे

नींद नइ परे मच्छर ह चाबत हे

भरे गरमी में लइका इस्कूल जावत हे

पसीना चुचवात अऊ भात ल खावत हे

कक्षा में बइठे सब झन उसनावत हे

गुरूजी मन के घेरी बेरी टोंटा सुखावत हे

महेन्द्र देवांगन माटी

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