Monday, 15 February 2016

मोर गवंई गांव

मोर गंवई गांव
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मोर सुघ्घर गंवई के गांव
जेमे हाबे पीपर के छांव
बर चंउरा में बैइठ के गोठियाथे
नइ करे कोनों चांव चांव ।
होत बिहनिया कूकरा बासत
सब झन ह उठ जाथे
धरती दाई के पांव परके
काम बूता में लग जाथे
खेती किसानी नांगर बइला
छोड़ के मय कहां जांव
मोर सुघ्घर गवंई के गांव
जेमें हाबे पीपर के छांव ।

नता रिसता के मया बोली
सबला बने सुहाथे 
तीज तिहार के बेरा में सबझन
एके जगा सकलाथे
सुघ्घर रीति रिवाज इंहा के
"माटी" परत हे पांव
मोर सुघ्घर गवंई के गांव
जेमे हाबे पीपर के छांव ।

माटी के सेवा करे खातिर
जांगर टोर कमाथे
धरती दाई के सेवा करके
धान पान उपजाथे
बड़ मेहनती इंहा के किसान हे
दुनिया में हे जेकर नांव
मोर सुघ्घर गवंई के गांव
जेमे हाबे पीपर के छांव ।

छत्तीसगढ़ के भाखा बोली
सबला बने सुहाथे
गुरतुर गुरतुर भाखा सुनके
दुनिया मोहा जाथे
बड़ सीधवा हे इंहा के मनखे
जिंहा मया पिरीत के छांव
मोर सुघ्घर गवंई के गांव
जेमे हाबे पीपर के छांव
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Ⓜमहेन्द्र देवांगन "माटी"Ⓜ
              बोरसी

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