Wednesday, 27 January 2016

नकल

नकल - महेन्द्र देवांगन माटी
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कविता उपर सब कविता लिखत हे
आघू पाछू कुछू नइ दिखत हे
दूसर के रचना ल नकल करत हे
अपन नाम चलाय बर सबो मरत हे ।
अपन विवेक से लिख के, दुनिया ल देखावव
चोरी करके रचना ल, अपयस झन कमावव
कवि बने चक्कर में, कतको कविता चोरावत हे
दूसर के नाम ल मेटाके, अपन नाम लिखावत हे
नकल करे बर अकल चाही, अकल से काम चलावव
खुद मेहनत करके संगी, दुनिया में नाम कमावव।
महेन्द्र देवांगन माटी
mahendradewanganmati@gmail.com

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