Sunday, 24 January 2016

पितर

पितर
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जिंयत भरले सेवा नई करे,मरगे त खवावत हे |
बरा सोंहारी रांध रांधके,पितर ल मनावत हे ||
अजब ढंग हे दुनिया के,समझ मे नइ आये|
जतका समझेक कोशिश करबे,ओतकी मन फंस जाये ||
दाई ददा ह घिलर घिलरके,मांगत रिहिस पानी |
बुढत काल मे बेटा ह,
याद दिला दिस नानी||
दाई ददा ह मरगे तब,
आंसू ल बोहावत हे
बरा सोंहारी............
एक मुठा खाय ल नइ देवे,देवे वोला गारी |
बेटा होके बापके,करे निंदाचारी ||
वोकरे कमई के राज म
बइठे बइठे खावत हे|
भुलागे सब एहसान ल,गुण ल तक नई गावत हे ||
मरगे बाप ह तब ,मांदी ल खवावत हे
बरा सोंहारी...........
बड़े बिहनिया सुत उठके,तरिया मे जाथे|
आत्मा ओकर शांति मिले,पानी देके आथे||
कांव कांव करके कौआ ह,बरेण्डी मे आथे |
दाई ददा ह आगे कहिके,बरा ल खवाथे
मरगे दाई ददा तब,आनी बानी के खवावत हे
बरा सोंहारी...........
पहिली ले सेवा करतेयस,मिलतीस तोला सुख |
कांही बातके जिनगी म,नइ होतिस तोला दुख
देखा सीखी तोरा बेटा
करही तोला वोइसने
देही दुख तंहू ल,करे हस ते जइसने
समय ह निकलगे तब
पाछू बर पछतावत हे
बरा सोंहारी....
जिंयत भरले............

रचनाकार
महेन्द्र देवांगन "माटी"
बोरसी - राजिम (छ. ग.)
8602407353

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