Saturday, 23 January 2016

मटमटहा टूरा

मटमटहा टूरा
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पढई लिखई मे ठिकाना नइहे ,
गली मे मटमटावत हे
हार्न ल बजा बजाके
फटफटी ल कुदावत हे

घेरी बेरी दरपन देखके
चुंदी ल संवारत हे
आनी बानी के किरीम लगाके
चेहरा ल चमकावत हे

सूटबूट पहिन के निकले
चशमा ल लगावत हे
मुंहू म गुटका दबाके
सिगरेट के धुंवा उडावत हे

मोबाइल ल कान मे लगाके
फुसुर फुसुर गोठियावत हे
फेसबुक अउ वाटसप चलाके
मने मन मुस्कावत हे

संगी साथी संग घुम घुमके
आदत ल बिगाडत हे
फोकट म खाय ल मिलत त
बाप के कमई ल उडावत हे

लाज शरम तो बेचा गेहे
कनिहा ल मटकावत हे
नाक तो पहिली ले कटा गेहे
अब कान ल छेदावत हे |

रचनाकार
महेन्द्र देवांगन "माटी"
( बोरसी - राजिम वाले )
गोपीबंद पारा पंडरिया
जिला - कबीरधाम (छ. ग)
8602407353
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इसे gurturgoth.com पर भी देख सकते हैं

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